Thursday, 16 March 2017

GAZAL




क़साब बनकर मिलोगे तो क्या हिसाब दूंगा
महब्बतो का महब्बतों से जवाब दूंगा-----
तुम्हारी खातिर ज़रूर इतना करूँगा लेकिन
खुशामदीं के दो बोल कहकर गुलाब दूंगा----
खुदा नही मै के पल में दिल को बदल के रख दू
हा उनको तोहफ़े में इश्क़ की इक किताब दूंगा---
नसीहतों का अभी ज़माना रहा कहा है
अभी तो अहलेसुखन का उनको ख़िताब दूंगा----
अभी जरासा है होश बाकी खुदी का साकी
ये वादा कर दे के बेखुदीतक शराब दूंगा-----
वो इतना खुलकर हरेक पर्दा हटा रहे है
के सोचता हूँ जरासा उनको हिजाब दूंगा----
ख़याल में तो उन्ही की खुश्बू ख़लिश बसी है
मै अपने लहज़े का थोड़ा उनमे शबाब दूंगा----
ख़लिश-------

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