Thursday, 28 December 2017
Sunday, 24 December 2017
Thursday, 14 December 2017
Tuesday, 5 December 2017
Thursday, 2 November 2017
Wednesday, 25 October 2017
Monday, 23 October 2017
Saturday, 19 August 2017
Thursday, 16 March 2017
GAZAL
क़साब बनकर मिलोगे तो क्या हिसाब दूंगा
महब्बतो का महब्बतों से जवाब दूंगा-----
तुम्हारी खातिर ज़रूर इतना करूँगा लेकिन
खुशामदीं के दो बोल कहकर गुलाब दूंगा----
खुशामदीं के दो बोल कहकर गुलाब दूंगा----
खुदा नही मै के पल में दिल को बदल के रख दू
हा उनको तोहफ़े में इश्क़ की इक किताब दूंगा---
हा उनको तोहफ़े में इश्क़ की इक किताब दूंगा---
नसीहतों का अभी ज़माना रहा कहा है
अभी तो अहलेसुखन का उनको ख़िताब दूंगा----
अभी तो अहलेसुखन का उनको ख़िताब दूंगा----
अभी जरासा है होश बाकी खुदी का साकी
ये वादा कर दे के बेखुदीतक शराब दूंगा-----
ये वादा कर दे के बेखुदीतक शराब दूंगा-----
वो इतना खुलकर हरेक पर्दा हटा रहे है
के सोचता हूँ जरासा उनको हिजाब दूंगा----
के सोचता हूँ जरासा उनको हिजाब दूंगा----
ख़याल में तो उन्ही की खुश्बू ख़लिश बसी है
मै अपने लहज़े का थोड़ा उनमे शबाब दूंगा----
मै अपने लहज़े का थोड़ा उनमे शबाब दूंगा----
ख़लिश-------
GAZAL
" वो कहर ढाया तेरी अंगडाइने
शर्म से पानी हुए खुद आईने"
शर्म से पानी हुए खुद आईने"
" ढल गई वो आप ही तस्वीर में
यूं ही कागज़ पर खिंची थी लाइनें"
यूं ही कागज़ पर खिंची थी लाइनें"
" कम समझकर पाँव पानी में रखा
दे दिया धोका हमे गहराई ने"
दे दिया धोका हमे गहराई ने"
" नेकनामी को समझते थे भला
तोड़ डाला वो भरम रुस्वाइने"
तोड़ डाला वो भरम रुस्वाइने"
"उम्रभर बस हम ग़ज़ल कहते गए
उम्रभर पीछा किया परछाइने'
उम्रभर पीछा किया परछाइने'
हा ख़लिश सस्ते में हमको ले लिया
सोच की बढ़ती हुई महंगाइने"
सोच की बढ़ती हुई महंगाइने"
ख़लिश------
Monday, 6 March 2017
आंख ठहरी हुई है-----
है मुनासिब ये जुमला सफ़र के लिए
घर से बाहिर मै निकला हूं घर के लिए-----
घर से बाहिर मै निकला हूं घर के लिए-----
चारसू कोहरा है ग़रज़ का रवां
दो क़दम भी है मुश्किल बशर के लिए-------
दो क़दम भी है मुश्किल बशर के लिए-------
ख़ूनेदिल मांगती है नफ़स-दर-नफ़स
शेर मुश्किल सी शै है जिग़र के लिए--------
शेर मुश्किल सी शै है जिग़र के लिए--------
लफ्ज़ ख़ुद इंतिखाबेग़ज़ल हो गए
आप ठहरे हुए है बहर के लिए------
आप ठहरे हुए है बहर के लिए------
है तो आंखों की ज़द मे नज़ारें बहुत
आंख ठहरी हुई है नज़र के लिए-------
आंख ठहरी हुई है नज़र के लिए-------
हमने सोचा न था दिल मे उठ जाएगी
हमने चाही दिवारें थी घर के लिए-----
हमने चाही दिवारें थी घर के लिए-----
इक ख़लिश हासिलेज़िन्दगी हो गई
इक ख़ुशी मिल गई उम्रभर के लिए-------
इक ख़ुशी मिल गई उम्रभर के लिए-------
ख़लिश----------------
मुस्कुराना रिवाज़ क्यों कर है-----
हरतरफ़ एतिराज़ क्यों कर है
सुर से नाख़ुश ये साज़ क्यों कर है-----
सुर से नाख़ुश ये साज़ क्यों कर है-----
बज़्म सारी उदास बैठी है
ये क़यामत रियाज़ क्यों कर है-----
ये क़यामत रियाज़ क्यों कर है-----
बस के चुप है तो चुप ही रहने दो
ये न पूछो लिहाज़ क्यों कर है-----
ये न पूछो लिहाज़ क्यों कर है-----
दिल को जानोगे दिल से जानो तो
हमको दिलपर यूं नाज़ क्यों कर है-----
हमको दिलपर यूं नाज़ क्यों कर है-----
हर ख़ुशी सूखकर हुई कांटा
एक बस ग़म गुदाज़ क्यों कर है------
एक बस ग़म गुदाज़ क्यों कर है------
इस पे क्या दे जवाबेअश्क़ ख़लिश
मुस्कुराना रिवाज़ क्यों कर है-----
मुस्कुराना रिवाज़ क्यों कर है-----
ख़लिश----------------
गुदाज़---मांसल,(इथे ताज़ातवाना असा घेतला आहे)
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