Wednesday, 9 November 2016

 फिर गुलाबो का मौसम खिला है फिर कोई याद आने लगा है 


दूर खुलती हुई खिड़कियों में कोई  अंगड़ाईयां ले रहा है 

Tuesday, 8 November 2016


टूटे हुए रिश्तो का हर जख़्म हरा लिखना 
जब भी उसे ख़त लिखना आदाब मेरा लिखना 



Monday, 7 November 2016

नसीब आजमाने के दिन आ रहे हैं 
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे है 
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती 
निगाहे चुराने के दिन आ रहे है।
कलाम - फैज़  अहमद फैज फैज 
गायक- बुद्धरत्न लिहीतकर